तीसरी दुनिया के परिप्रेक्ष्य में अंतर्राष्ट्रीय विधि पढ़ाने के मेरे अनुभव

– प्रोफेसर विजय किशोर तिवारी

(This blog is the second in the series of blogs that JILS will publish in various vernacular languages as a part of its new initiative to mark the International Mother Language Day.)

 

बीए द्वितीय वर्ष की बात रही होगी जब मैनें प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा की किताब ‘ इतिहास के बारे में’ पढ़ी थी। वो किताब मेरे सम्मुख एक बड़ा सवाल छोड़ गई। सवाल ये था की इतिहासबोध को जनता तक कैसे लेकर जाया जाये। कहीं ऐसा ना हो की हम अपने विश्वविद्यालय में इतिहास की तमाम धाराओं पर वाद प्रतिवाद करते रहें और आम आदमी अपने गल्पों और राजा रानी की कहानियों को ही इतिहास समझता रहे। शायद इसी सवाल का उत्तर खोजने के लिये ही मैने ‘तीसरी दुनिया के परिप्रेक्ष्य में अंतरराष्ट्रीय विधि पढ़ाने का निश्चय किया।
इस विषय को पढ़ाने में तमाम चुनौतियां थी। पहली बड़ी चुनौती खुद ‘नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी’ की संकल्पना से आयी। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की संकल्पना भारत मे ‘पोस्ट- लिबरलाइजेशन’ के बाद उभरे बाज़ार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिये हुईं। अव्वल तो सवाल ये कि अगर बाज़ार हमें रोज़गार दे रहा तो हम उस विषय का चुनाव क्यूँ करे जो शायद बाज़ार के हितों की पूर्ति नहीं करता है और जिसकी कोई उपयोगिता ‘डे ज़ीरो’ में ना होगी। दूसरा अहम सवाल ये हम ‘तीसरी दुनिया और उसके दृष्टिकोण’ की चर्चा ही क्यूँ करें जब शीत युध्द को बीते तीन दशक हो गये और  इतिहास के अंत और पूँजीवाद की विजय को इस समय का सबसे बड़ा सत्य घोषित कर दिया गया है। सवाल ये भी है की क्या ‘ तीसरी दुनिया’ अब बची भी है जैसा की कुछ पाश्चात्य चिंतक ये सवाल
खड़ा कर रहे।
इस विषय को पढ़ना एक बड़े लक्ष्य से जुड़ा हुआ है। वह लक्ष्य भारतवर्ष में  विधि की शिक्षा का विऔपनिवेशिकरण करना  है। उपनिवेशवाद ने हमारे सोचने समझने के दृष्टिकोण पर अपना प्रभाव डाला है। ‘वेस्ट’ के ज्ञान और दृष्टिकोण को बिना कोई सवाल किये स्वीकार कर लिया। हमारे स्कूलों और यूनिवर्सिटीज़ ने औपनिवेशिक विजय को स्थायी बनाने का कार्य किया।
‘इंटरनेशनल लॉ’ और कॉमन लॉ लीगल सिस्टम के पूर्वाग्रहों को ‘नॉर्मल’ मानकर स्वीकार कर लिया गया। ‘ओरिएन्ट’ के इतिहास,संस्कृति, तमाम भाषाओं और विधिक प्रणाली को निम्नस्तरीय घोषित किया गया।  यूरोप अकेला ज्ञान और संस्कृति का आधारबिन्दु माना गया। बीसवीं शताब्दी में राजनितिक तौर पर विऔपनिवेशिकरण ज़रुर हुआ मगर साँस्कृतिक और शैक्षणिक स्तर पर ये होना शेष है!
TWAIL को पढ़ना और पढ़ाना खुद से साक्षात्कार करने सरीखा है। ये खुद की पहचान पाने की कोशिश। अपने खुद के ‘उलगुलान’ का इतिहासबोध है! महाकवि अज्ञेय की कविता से अपनी बात का अंत करता हूँ:
जो पुल बनाएँगे
वे अनिवार्यत:
पीछे रह जाएँगे।
सेनाएँ हो जाएँगी पार
मारे जाएँगे रावण
जयी होंगे राम,
जो निर्माता रहे
इतिहास में
बन्दर कहलाएँगे।
The author, Professor Vijay Kishor Tiwari, is a Professor of Law at The National University of Juridical Sciences (NUJS), Kolkata.

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