विदेशी न्यायाधिकरण: न्यायसंगत या पक्षपात कानून के संस्थान?

– रोहित शर्मा

 

(This blog is the eighth in the series of blogs that JILS will publish in various vernacular languages as part of its initiative to mark the International Mother Language Day. )

 

कुछ दिनों  पहले 12 विदेशी न्यायाधिकरण(Foreign Tribunals) के सदस्यों ने कोविड राहत कार्य हेतु मौद्रिक सहयोग प्रदान किया गया  । हालांकि  इस   सहयोग  के  साथ  इन  सदस्यों  ने शर्त रखी जिसके अंतर्गत यह सहयोग तब्लीग़ी जमात के “जिहादी” एवं “जाहिल” संक्रमित लोगो को नहीं दिया जाना चाहिए ।[1]  अब सवाल यह उठता है कि क्या ये सदस्य ऐसे न्यायाधिकरण में बिना किसी समुदाय के पक्षपात के निर्णय लेते हैं या नहीं ?

इस ब्लॉग में मैं असम के नागरिको के राष्ट्रीय रजिस्टर(National Register of Citizens) के अंतर्गत नागरिकता तय करने वाले विदेशी न्यायाधिकरण के संगठन एवं उसके पीछे की वैद्यता की जांच करूँगा । इसके अलावा मैं यह भी देखूंगा कि क्या  इन न्यायाधिकरणों का संघठन वाकई एक वैध प्रक्रिया है और इन न्यायाधिकरणों की सदस्यता किस प्रकार जिम्मे की जाती है ।

नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) के प्रकाशन के बाद, 1,906,657 लोगों का नाम भारतीय नागरिक होने की सूची से गायब बताया गया था ।[2]

इस सूची से बाहर किए गए लोगों के लिए असम सरकार ने अब 521 विदेशी ट्रिब्यूनल स्थापित करने का एलान किया,जहाँ ये लोग फिर से सूची में आने के लिए आवेदन देंगे । गौहाटी उच्च न्यायालय ने हाल ही में विदेशी ट्रिब्यूनल के सदस्यों के रूप में नियुक्ति के लिए चुने गए 221 लोगों की एक सूची की घोषणा की है  ।[3] वर्तमान में, असम में 100 विदेशी ट्रिब्यूनल हैं और इसके साथ असम बाक़ी जिलों में 221 अतिरिक्त न्यायाधिकरण  स्थापित करने के लिए कवायद कर रही है ।

इन न्यायाधिकरणों को अर्ध-न्यायिक अदालतों ( quasi  judicial  body ) का रूप देकर एनआरसी की सूची से बाहर होने वालों की अपील सुनने के लिए अनिवार्य किया गया है । यह अपील का अधिकार नागरिकता नियम, 2003 के नियम 8 के अनुसार प्रदान किया गया है जिसके अंतर्गत  किसी का नाम NRC में शामिल न होने के कारण उसे यकायक विदेशी नहीं माना जाएगा। इसके अतिरिक्त जिस व्यक्ति  का नाम NRC में शामिल नहीं किया गया है, वह अस्वीकृति की प्रमाणित प्रति प्राप्त करने के 120 दिनों के भीतर विदेश न्यायाधिकरण के पास अपील कर सकता है।[4]

  1. नया संशोधित विदेशियों (ट्रिब्यूनल) संशोधन आदेश, 2019 (Foreigners (Tribunals) Order, 2019) क्या है ?

गृह मंत्रालय ने विदेशियों (ट्रिब्यूनल) के आदेश, 1964 में संशोधन किया जिसके द्वारा जो हक़ न्यायाधिकरण स्थापित करने का  केवल केंद्र सरकार के पास निहित था,  वह अब सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जिला मजिस्ट्रेटों को भी दे दिया गया है । इसके अलावा यह संशोधन जिला मजिस्ट्रेटों द्वारा ट्रिब्यूनल को अपनी राय के लिए संदर्भित करता है कि अपीलकर्ता एक “विदेशी” हो सकता है या नहीं ।

      2. न्यायाधिकरण की सदस्यता

भारतीय कानून के अनुसार हर  न्यायाधिकरण को अर्ध-न्यायिक अदालतों की  तरह कार्य करने का दर्जा प्राप्त  है। इसका सञ्चालन हेतु नियुक्त सदस्य  विदेशी ट्रिब्यूनल अधिनियम, 1941 और विदेशियों (ट्रिब्यूनल) आदेश, 1984 के अनुसार सरकार द्वारा दिशानिर्देशों के अनुसार काम करते हैं ।[5]  ऐसे सदस्य बनने की योग्यता, असम न्यायिक सेवा में  एक सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी, एक सेवानिवृत्त सिविल सेवक और न्यायिक अनुभव के साथ अतिरिक्त सचिव,(retired judicial officer of the Assam Judicial Service, a retired civil servant and Additional Secretary with judicial experience ) या 35 वर्ष से कम आयु का और कम से कम सात साल के अभ्यास के साथ एक वकील होना  है ।[6] इसके अलावा सदस्य को असम (असमिया, बंगाली, बोडो और अंग्रेजी) की आधिकारिक भाषाओं और इस मुद्दे को जन्म देने वाली राज्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उचित ज्ञान होना आवश्यक है।

      3. न्यायाधिकरण की कार्य पद्धति: लोकतांत्रिक समाजवादी देश पर हमला

संविधान में 42वां संशोधन ने संविधान में  एक नया भाग XIVA जोड़ा ,जिसके अंतर्गत सभी न्यायाधिकरणों का गठन किया गया इन न्यायाधिकरणों को प्रशासनिक न्यायाधिकरण  (अनुच्छेद  323 ए) और अन्य उद्देश्य हेतु न्यायाधिकरण (अनुच्छेद  323 बी) के तौर पर दो भागो में बाँटा गया हैं । हालांकि विदेश न्यायाधिकरण का निर्माण 1946 के द फॉरेनर्स एक्ट के अंतर्गत किया गया था ।  इसमें से सबसे मुख्य बात यह है कि इन न्यायाधिकरण का मुख़्य जिम्मा यह देखना था कि विदेशी भारतीय हैं या नहीं, न की भारतीयों को देखना की वह विदेशी हैं या नहीं । इसके हेतु मैं तर्क करता हूं कि इन न्यायाधिकरण का अधिकार – क्षेत्र(jurisdiction ) कानून की नजर में सही नहीं है और इन संस्थानों को वैधता प्रदान करने  हेतु सरकार द्वारा एक अलग विधान निकलना ज़रूरी है ।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की सितम्बर, 2019 की रिपोर्ट के अनुसार असम सरकार  विदेश न्यायाधिकरण के सदस्यों के कार्यकाल का फैसला उनके द्वारा ज्यादा से ज्यादा  लोगों को विदेशी घोषित करने के आधार पर लेती है।[7] इसके अलावा कई मौकों पर इन चयनित सदस्यों द्वारा  वादियों के साथ अपमानजनक भाषा का उपयोग, स्वयं स्थापित प्रक्रियाओं का नियंत्रण (Control of self established process) मनमाने तरीके से लागू किया जाता है । यह दर्शाता है की किस प्रकार यह न्यायाधिकरण  प्राकृतिक न्याय के  सिद्धांतो(principles of natural justice)  को अनदेखा करके उनका उल्लंघन कर रहे हैं । । प्रसिद्ध शिक्षाविद और प्रोफेसर फैज़ान मुस्तफा के अनुसार ये न्यायाधिकरण कंगारू कोर्ट ( अनौपचारिक अदालत  जहाँ व्यक्ति एवं समुदाय विशेष को किसी विशेष अपराध या दुष्कर्म के दोषी के रूप में, बिना सबूतों के जिम्मेदार ठहरा दिए जाता है) की तरह काम करते हैं ।[8]

यह न्यायाधिकरण कई मामलों में गांवों के निवासियों को 24 से 48 घंटे की सूचना देकर बुला लेते है ।  इसके अलावा वह गांव जो इन न्यायाधिकरण से ३००-४०० मील की दूरी पर हैं वहां के निवासियों को साधन की व्यवस्था भी नहीं मुहैया कराई जाती है । [9] यह न्यायाधिकरण , 1964 के विदेशियों के अधिकरण आदेश के पैरा 3 (1)  का उल्लंघन भी करती है जब वह नोटिस में “मुख्य आधार” का उल्लेख किए बिना गाँव वालो को बुला लेती हैं जिससे इन निवासियों को बिना आरोप जाने बचाव करने जाना पड़ता है ।[10]

इसके सन्दर्भ में 787 मामलों के विश्लेषण के बाद, यह पाया गया कि  इन न्यायाधिकरणों द्वारा हर दो लोगों में से एक को विदेशी घोषित किया जाता है क्योंकि ये व्यक्ति  यह साबित करने में विफल रह जाते हैं कि उत्पादित दस्तावेज  वास्तविक और सत्य हैं।[11]

गौहाटी उच्च न्यायालय ने अपने सू मोटो(suo motu ) कार्यवाही के 2018 के  आदेश में – मोरीगांव न्यायाधिकरण  के 57 मामलों में कार्यवाही को खारिज कर दिया था और इसके साथ साथ इन मामलों को नए सिरे से सुना जाने का आदेश दिया।[12] इसके अलावा 282 मामलों में से कुछ के विवरण पर अदालत ने पाया कि नोटशीट पर 17 लोगों को भारतीय नागरिक घोषित किया गया था, लेकिन आदेश ने उन्हें विदेशी घोषित कर दियाI[13]

सबसे चिंतनीय मामले वह थे जब 11 मामलों में, रिकॉर्ड पर निर्णय ही नहीं मिला एवं 32 मामलों में लोग पहले पूर्व-घोषित विदेशी थे, लेकिन अंततः भारतीय पाए गए।[14] यह सभी उदहारण यह दर्शाते हैं कि इन न्यायाधिकरण में कानून के नियम( rule  of law ) के कार्यान्वयन का दूर-दूर तक कोई ठिकाना नहीं हैं ।

सोनोवाल (2005) केस [15] के अनुसार अब नागरिकता साबित करने का भारी बोझ नागरिकों के ऊपर  है -जिसका मतलब है कि राज्य के बजाय अब नागरिको को लिंकेज दस्तावेजों के आधार पर दर्शाना पड़ेगा कि वह 1971 के पूर्व  भारत में रह रहे थे । असम एक ऐसा राज्य है जहाँ लाखों की तादात में अनपढ़ और निराश्रित रहते हैं और कागजात बचाने हेतु हर साल बाढ़ का डर सहते हैं । ऐसे में इस विवादास्पद फैसले के कारण, कई वास्तविक नागरिकों को NRC की सूची से बाहर रखा गया है और और इसके साथ साथ कइयों को निरोध केंद्रों (Detention centre) में दयनीय स्थिति में रहने के लिए मजबूर किया गया है। जनवरी 2020 तक इन केंद्रों में मरने वालो की संख्या ३० के आस पास हो गयी थी जो इस देश में जान की सस्ती कीमत दर्शाता है ।[16]

आम तौर पर आपराधिक कानून में, अदालत के सामने गवाह के  पेश होने की विफलता में गिरफ्तारी वारंट जारी किया जाता है । मेरा मानना है कि इसी तरह के मानकों को इन मामलों में भी दिया जा सकता है खासतौर पर जब सवाल नागरिकता और जीवन के  अधिकार का हो ।

इसके अलावा कई मामलों में यात्रा करते समय और अन्य अनुपालन करने के बाद वादियों की बचत के साथ साथ पूरी आय समाप्त हो जाती है । इसके अलावा, उन्हें सरकारी कार्यालयों पर हजारों दस्तावेजों और सरकारी अधिकारियों के लिए खोज करना पड़ता है, जिस खर्चे को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। उपरोक्त चर्चा से यह सवाल उठता है कि वह लोग जो समाज में सबसे हाशिए पर टिके हुए हैं, क्या उनके लिए ऐसे अनुचित नियम बनाना सरकार की गैर ज़िम्मेदारी को नहीं दर्शाता है ? मेरा मानना है कि जिन मामलों में व्यक्ति की आर्थिक परिस्थति  ठीक नहीं हैं, उन मामलों में सरकार को उसके कानूनी  व्यय वहन करना चाहिए ।

मैं फैजान मुस्तफा से सहमति जताता हूं जिनके अनुसार इन न्यायाधिकरण  को संबंधित उच्च न्यायालयों की सख्त निगरानी में रखकर सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना चाहिए ।[17] इसके अलावा इसकी सदस्यता केवल न्यायिक अनुभव वाले व्यक्ति को नियत प्रक्रिया का पालन करने के बाद ही देनी चाहिए । अन्यथा, ये न्यायाधिकरण न्याय के लिए प्रतिबद्ध एक राष्ट्र के रूप में भारत की स्थिति को नुकसान पहुंचाएंगे।

 

The author, Rohit Sharma, is currently the Editor at JILS and in charge of the JILS Blog. He is also a final year law student at the National University of Juridical Sciences (NUJS), Kolkata.

 

[1] Assam: Foreigners Tribunal Member Sends Donation to Govt for COVID-19, Urges Not to Aid Tablighi Jamaat Attendees, Inside NE (11/04/2020), available at https://insidene.com/2020/04/11/assam-foreigners-tribunal-member-sends-donation-to-govt-for-covid-19-urges-not-to-aid-tablighi-jamaat-attendees/ last seen on 26/04/2020

[2] Manogya Loiwal, Assam NRC: Foreigners Tribunals set to hear appeals, India Today (03/09/2019) available at https://www.indiatoday.in/india/story/assam-nrc-foreigners-tribunals-1594975-2019-09-03 last seen on 26/04/2020

[3] Ibid

[4] B Singh, NRC List Impact: Assam’S Foreigner Tribunals To Have 1,600 On Contract.  The Economic Times (30/09/2019)  Available at https://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/nrc-list-impact-assams-foreigner-tribunals-to-have-1600-on-contract/articleshow/71368675.cms?from=mdr last seen on 26/04/2020

[5] Vijaita Singh and Rahul Karmakar, Why does Assam need more Foreigners Tribunals? The Hindu (16/06/2019) https://www.thehindu.com/news/national/other-states/why-does-assam-need-more-foreigners-tribunals/article27951416.ece last seen on 26/04/2020

[6] Ibid

[7] Assam decides tribunal member’s term on rate of declaring foreigners: Amnesty, The Hindu(12/03/2020) Available at https://www.thehindu.com/news/national/other-states/assam-decides-tribunal-members-term-on-rate-of-declaring-foreigners-amnesty/article31051919.ece last seen on 26/04/2020

[8] Faizan Mustafa,Kangaroo tribunals: Foreigners’ Tribunals almost another arm of BJP government in Assam The Indian Express (8/10/2019) Available at https://indianexpress.com/article/opinion/columns/supreme-court-foreigners-tribunals-assam-nrc-6058158/ last seen on 26/04/2020

[9] Ibid

[10] Ibid

[11] Shruthi Naik and Leah Verghese, What 787 Cases in the Gauhati HC Tell Us About How ‘Suspected Foreigner’ Cases Are Decided , The Wire (11/03/2020) Available at https://thewire.in/law/assam-suspected-foreigners-tribunal-high-court last seen on 26/04/2020

[12] CJP Team, Assam FT declares 282 people foreigner: Signed orders MISSING or full of errors, CJP (25/09/2019) Available at https://cjp.org.in/exclusive-assam-ft-orders-missing-or-full-or-errors/ last seen on 26/04/2020

[13] Ibid

[14] Supra 8

[15] Sarbananda Sonowal v. Union of India, A.I.R. 2005 S.C. 2920

[16] Ratnadip Choudhury,Man Lodged In Assam Detention Centre Dies, 29th Death In 3 Years, NDTV (05/01/2020) https://www.ndtv.com/india-news/man-lodged-in-assam-detention-centre-dies-29th-death-in-3-years-2158934 last seen on 26/04/2020

[17] Supra 8

Leave a comment