कानून की नज़र में लिव-इन रिलेशनशिप की स्थिति

By Raju Ram

(This is our fifth vernacular post under the 2021 edition of the JILS Vernacular Publication Initiative, that marks the celebration of the International Mother Language Day. Through this initiative, we at JILS, are attempting to take a small step towards making legal education and information more inclusive and accessible, and countering the stronghold of English in legal academia with publication in vernacular languages.)

परिचय

बदलाव प्रकृति का नियम है और भारतीय समाज भी इस नियम का अपवाद नहीं है । युवा, तेजी से अपने जीवन जीने के अंदाज बदल रहें हैं । विश्व स्तर पर लोग धीरे-धीरे पूर्व-वैवाहिक सेक्स और लिव-इन रिलेशनशिप के विचार को समायोजित कर रहे हैं । हालांकि, भारत में जैसे ही पूर्व-वैवाहिक सेक्स और लिव-इन रिलेशनशिप का ज़िक्र आता है तो ज्यादातर लोग रूढ़िवादी हो जाते है ।

भारत में लड़का और लड़की के बीच उन संबंधों को ही वैध माना जाता है, जहाँ पर दोनों के बीच विवाह, मौजूदा विवाह कानूनों के अनुसार हुआ हो अन्यथा अन्य सभी प्रकार के संबंधों को नाजायज माना जाता है । भारत में लिव-इन रिलेशनशिप की न ही कोई कानूनी परिभाषा है और न ही इस विषय पर उनके अधिकारों को लागू करने से सम्बंधित कोई कानून है । हालाँकि, अदालतों ने निर्णयों के माध्यम से लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा पर प्रकाश डाला है । इस संबंध की स्थिति के बारे में न्यायशास्त्र अभी भी स्पष्ट नहीं है, लेकिन भारत में न्यायालयों द्वारा कुछ अधिकार प्रदान किए गए हैं ।

इस लेख में लेखक ने कुछ सवालों का विश्लेषण किया हैं जैसे कि, लिव-इन रिलेशनशिप की परिभाषा क्या है ? लिव-इन रिलेशनशिप की आवश्यक विशेषताएं क्या हैं ? और पार्टनर्स एवं उनके बच्चों की संपत्ति के अधिकार के संबंध में कानून में हालिया विकास क्या हैं ? इत्यादि ।

यह लेख भारत में लिव-इन पार्टनर्स एवं उनके बच्चों को उत्तराधिकार हासिल करने के लिए एक उचित कानूनी ढांचे की आवश्यकता पर बल देता है । सुप्रीम कोर्ट ने न केवल यह कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप वैध है, बल्कि यह भी घोषित किया है कि लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा होने वाले बच्चे जायज़ हैं और उनको भी संपत्ति का उत्तराधिकार प्राप्त है ।[1] इस संदर्भ में, वर्तमान कानूनों और निर्णयों की वैधता का विश्लेषण करना आवश्यक है ।

कानून की नज़र में लिवइन रिलेशनशिप की स्थिति

भारत के ज्यादातर लोग पूर्व-वैवाहिक सेक्स और लिव-इन रिलेशनशिप को पाबंद (taboo) मानते है, इसके प्रभाव को हम विवाह एवं उत्तराधिकार (succession) से सम्बंधित कानूनो में देख सकते है । भारत में लिव इन रिलेशनशिप की अवधारणा (concept) बिल्कुल नई अवधारणा नहीं है । गुजरात में  ‘मैत्री करार’ नामक प्रथा (practice) प्रचलित थी, जो की वर्तमान समय के लिव-इन रिलेशनशिप के समान थी, और इसे कानूनी मान्यता भी मिली हुई थी । इस प्रथा में महिला और पुरुष, मजिस्ट्रेट के सामने करार करके एकसाथ रहते थे । लेकिन गुजरात के उच्च न्यायालय ने मीनाक्षी जावेरभाई जेठवा मामले में इसे शून्य आदितः (void ab initio) घोषित कर दिया ।[2] इस प्रथा में युगल एक साथ रहते थे और पुरुष साथी को महिला साथी की वित्तीय आवश्यकताओ की पूर्ती करनी होती थी ।

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने ठाकुर गोकल चंद बनाम परवीन कुमारी  मामले में कहा कि “सहवास (shared cohabitation) को वैवाहिक संबंध के रूप में मानें जाने के पक्ष में खंडन करने योग्य उपधारणा (rebuttable presumption) है लेकिन जहां इसके विपरीत साक्ष्य मौजूद हैं, उन साक्ष्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है ।[3]  इंद्रा शर्मा  बनाम वी के शर्मा  के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “लिवइन रिलेशनशिप  तो पाप है और ही अपराध, हालांकि यह कुछ समाजों में स्वीकार्य नहीं हो सकता है [4]

एक और मामले में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि “लिवइन रिलेशनशिप तो पाप है और ही अपराध, और एक आदमी को कानून एवं नैतिकता के अंतर को याद रखना होगा । यह केवल अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात है ।[5] न्यायालय ने एक और मामले में कहा कि “लिवइन रिलेशनशिप स्वीकार्य हैं और अगर दो बालिग़ व्यक्ति साथ में रहते है तो इसे अवैध या गैरकानूनी नहीं माना जा सकता है [6]

और, एस.पी.एस. बालासुब्रमण्यम बनाम सुरत्तयन, मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि “अगर एक पुरुष और एक महिला एक ही छत के नीचे रहते हैं और कई वर्षों तक सहवास(cohabit) करते हैं, तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के तहत एक उपधारणा (presumption) होगी, कि वे पति और पत्नी के रूप में रहते हैं और ऐसी रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चे जायज़ होंगे [7]

इसके अलावा, डी. वैलूसामी बनाम डी.पचैयम्मल के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप की कुछ आवश्यक विशेषताएं बताईं है । न्यायलय ने कहा कि “हमारी राय में लिव इन रिलेशनशिपविवाह की प्रकृति में संबंधहै जो कि कॉमन लॉ विवाह के समान है कॉमन लॉ विवाहों की आवश्यकताऐं,-

() युगल को जीवनसाथी के रूप में खुद को समाज के सामने पेश करना चाहिए

() युगल विवाह करने योग्य कानूनी उम्र के होने चाहिए

() युगल अविवाहित होने सहित कानूनन विवाह करने योग्य होना चाहिए

() युगल स्वेच्छा से सहवास करना चाहिए और महत्वपूर्ण समय(significant time) के लिए जीवनसाथी के रूप में खुद को दुनिया के सामने पेश करना चाहिए [8]

अतः सर्वोच्च न्यायलय के ऐसे अनेक फैसलों में कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लिव-इन रिलेशनशिप कानून के दायरे में हैं और वैध विवाह से बने रिश्तों के समान हैं ।

लिवइन रिलेशनशिप में बच्चों एवं पार्टनर्स के सम्पत्ति के अधिकार

  • बच्चों के सम्पत्ति के अधिकार

एक बार जब यह स्थापित हो जाता है कि लिव-इन रिलेशनशिप कानून की नज़र में पूरी तरह से वैध हैं, तो यह देखना महत्वपूर्ण हो जाता है कि लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चों के पास, वैवाहिक जीवन से पैदा हुए बच्चों  के समान अधिकार हैं या नहीं ?

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 1996 एक फैसले में कहा कि हिन्दू विवाह अधिनियम, 1956 की धारा 16 द्वारा बनाई गई कानूनी कल्पना (legal fiction) के तहत लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चे जायज़ हैं लेकिन कोर्ट ने ऐसे बच्चों के संपत्ति के अधिकार को सीमित किया है ।[9] इन बच्चों को समान्य विवाह से पैदा होने वाले बच्चों के समान अधिकार नहीं दिए गए है जैसे कि, सामान्य विवाह से पैदा होने वाले बच्चों को उसके पैतृक संपत्ति (ancestral property) में हिस्सा मिलता है लेकिन लिव-इन रिलेशनशिप से जन्मे बच्चों को पैतृक संपत्ति में ऐसा कोई अधिकार नहीं मिलता हैं, ऐसे बच्चों को माता-पिता की केवल स्वयं अर्जित सम्पति (self-acquired property) में ही उत्तराधिकार (inheritance) का हक़ मिलता है ।[10]

चूँकि, विवाह की डी. वैलूसामी मामले में बताई गई शर्तों को पूरा करने के बाद लिव इन रिलेशनशिप एक वैध विवाह है, तो इस बात का कोई उचित कारण नहीं है कि लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा होने वाले बच्चों को पैतृक संपत्ति से वंचित रखा जाए ।

मद्रास उच्च न्यायालय ने मारगबंधु बनाम कोठंडाराम मामले में कहा कि सभी पैतृक संपत्ति विभाजन के लिए उत्तरदायी हैं । इसलिए, जब विभाजन की मांग की जाती है, तो संपत्ति को सभी हिस्सेदारों में आपस में समान रूप से बांटना पड़ता है, इस प्रकार नाजायज पुत्र भी जायज पुत्र के समान पैतृक संपत्ति के हकदार हैं ।[11] हालाँकि यह एक और वाद विवाद का विषय है कि क्या शून्य या शून्यकरणीय (void or voidable) शादियों से पैदा होने वाले बच्चे नाजायज़ है या उनके माता पिता ? क्योकि इस तरह के सम्बन्धो में बच्चो की कोई भूमिका नहीं होती है तो इन बच्चो को नाजायज़ कहना कहाँ तक उचित है ।

इस क्षेत्र में विधायिका का हस्तक्षेप होना चाहिए था जो कि नहीं है । इस प्रकार, यह सुनिश्चित करने के लिए विधायी सुधारों की आवश्यकता है कि इस तरह की रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चों को अपने माता-पिता की संपत्ति के साथ-साथ उनको पैतृक संपत्ति में भी उत्तराधिकार का हक़ दिया जाना चाहिए ।

  • पार्टनर्स के सम्पत्ति के अधिकार

हिंदू विधि में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8 के तहत अगर कोई आदमी बिना वसीयत लिखे मर जाता है तो उसकी विधवा को प्रथम वर्ग की वारिस का दर्जा मिलता है ।[12] इसके अलावा, इसी कानून की धारा 10 के तहत अगर उसका पति निर्वसीयत मर जाता है तो विधवा को अपने मृत पति की संपत्ति पर पूर्ण स्वामित्व के साथ एक हिस्से का अधिकार मिलता है ।[13] इसी तरह, इसी अधिनियम की धारा 15(ए) के तहत, पति को उसकी पत्नी की मृत्यु पर पत्नी की संपत्ति का एक हिस्सा पाने का अधिकार मिलता है ।[14]

हालाँकि, जहाँ तक लिव-इन रिलेशनशिप पार्टनर्स के संपत्ति के अधिकारों का सवाल है तो इससे निपटने के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं है । बहरहाल, डी. वैलूसामी मामले बताई गई शर्तों को पूरा करने पर लिव इन रिलेशनशिप को वैध विवाह के समान माना जाता है । चूंकि लिव-इन रिलेशनशिप को शादी के समान माना जाता है, फिर क्यों पार्टनर्स के हिस्सों के उल्लेख का कोई प्रावधान नहीं है ?

हालाँकि, विद्याधरी बनाम सुखराना बाई मामले में  सर्वोच्च न्यायालय ने पति और पत्नी के रूप में एक साथ रहने वाले व्यक्तियों के लिए एक उम्मीद पैदा की है जिसमे कोर्ट ने बोला कि “जो लोग लंबे समय तक लिवइन रिलेशनशिप में रहे हैं उन्हें उत्तराधिकार (inheritance) में संपत्ति प्राप्त हो सकती है[15] इस मामले में अदालत ने एक लिव-इन पार्ट्नर  (मृतक की पत्नी) के पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (inheritance certificate) दिया है ।

जैसा कि पहले भी कहा गया है, इन न्यायिक मामलों के बावजूद भी उक्त विषय पर अभी भी इन मामलो से निपटने के लिए कोई कानून नहीं है । बदलते हुए समाज एवं दुनिया में इस तरह की रिलेशनशिप की संख्या में वृद्धि को देखते हुए कानून की आवश्यकता दिखाई पड़ती है । इस प्रकार, यह सुनिश्चित करने के लिए विधायी सुधारों की आवश्यकता है कि इस तरह की रिलेशनशिप में शामिल पार्टनर्स को संपत्ति का उत्तराधिकार दिया जाये ।

निष्कर्ष और सुझाव

भारतीय अदालतों ने लिव इन रिलेशनशिप के कुछ पहलुओं का व्याख्यान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन अभी भी कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है । उदाहरण के लिए, दो पार्टनर्स को लिव इन रिलेशनशिप के योग्य होने के लिए कितने ‘महत्वपूर्ण समय’ (significant time) तक एक साथ रहने की आवश्यकता होंगी ? लिव इन रिलेशनशिप को साबित करने के लिए किस तरह के ‘सबूत’ जरूरी होंगे ? क्या प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही पर्याप्त होगी या इस तरह की रिलेशनशिप का पंजीकरण एक आवश्यक शर्त होगी ? यदि मौजूदा कानूनी प्रणाली के तहत व्याख्या की जाती है तो कौन से कानून के तहत इस रिलेशनशिप को नियंत्रित किया जाना चाहिए ? इन सभी सवालों के जवाब दिए जाने की आवश्यकता है ।

इसके अलावा, न्यायपालिका ने खुद स्वीकार किया  है कि i) लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चे जायज़ है, ii)  लिव-इन रिलेशनशिप को शादी की तरह माना जाए  बशर्ते कि ऐसी रिलेशनशिप डी. वैलूसामी मामले में बताई गई शर्तों को पूरा करे। इन सब बातो को मद्देनजर रखते हुए यह कहना ठीक होगा कि लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चे को पैतृक संपत्ति से वंचित करने एवं पार्टनर्स को भी हिस्सेदार न मानने के लिए कोई उचित आधार नहीं है । यदि लिव इन रिलेशनशिप में शामिल किसी महिला को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत या, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के तहत या, भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत, एवं घरेलू हिंसा अधिनियम के सभी उद्देश्यों के लिए ‘पत्नी’ माना जा सकता है[16], तो फिर वह कौन सी बाधा है जो भारतीय न्यायपालिका एवं विधायिका को लिव इन रिलेशनशिप से जन्मे बच्चों को पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकार के हक़ देने से रोक रही है ?

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को गैरकानूनी नहीं घोषित किया है, परन्तु एक अलग और विशिष्ट कानून बनाने की आवश्यकता है, जो केवल इस सहवास से संबंधित हो । इस कानून में लिव-इन रिलेशनशिप को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए और इसमें शामिल पार्टनर्स के सभी अधिकारों को सूचीबद्ध किया जाना चाहिए। साथ ही, लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चे के भविष्य की सुरक्षा के लिए पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकार से सम्बंधित अधिकारों का भी प्रावधान होना चाहिए । विधायिका को, बदलते हुए समाज को ध्यान में रखते हुए  लिव इन रिलेशनशिप की अवधारणा को तुरंत मान्यता देने की आवश्यकता है ।

The author, Raju Ram, is currently a law student at the National Law University, Odisha.

We would like to extend our special thanks and gratitude to Aditi Singh, a third-year law student at the West Bengal National University of Juridical Sciences (NUJS), Kolkata, for assisting us with her review and inputs.


[1] भारत मठ बनाम आर विजया रंगनाथन, AIR 2010 SC 268.

[2] मीनाक्षी जावेरभाई जेठवा बनाम गुजरात राज्य, 2000 (2) GLR 1336.

[3] ठाकुर गोकल चंद बनाम परवीन कुमारी, AIR 1952 SC 231.

[4] इंद्रा शर्मा बनाम वी के शर्मा, (2013) 15 SCC 755.

[5] पायल शर्मा बनाम अधीक्षक, नारी निकेतन, आगरा, AIR 2001 All 254.

[6] एस. खुशबू बनाम कन्नीम्मल, (2010) 5 SCC 600.

[7] एस.पी.एस. बालासुब्रमण्यम बनाम सुरत्तयन, AIR 1994 SC 133.

[8] डी. वैलूसामी बनाम डी.पचैयम्मल, (2010) 10 SCC 469.

[9] परायण कंदयाल एरावत कनपरावन कल्लियानी अम्मा बनाम के. देवी (1996) 4 SCC 76.

[10] भारत मठ बनाम आर विजया रंगनाथन, AIR 2010 SC 268.

[11] मारगबंधु बनाम कोठंडाराम, AIR 1984 Mad 270.

[12] हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 धारा 8.

[13] हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 धारा 10.

[14] हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 धारा 15 (ए).

[15] विद्याधरी बनाम सुखराना बाई, (2008) 2 SCC 238.

[16] सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ललिता तप्पो बनाम झारखंड राज्य, क्रिमिनल अपील नंबर 1656/2015 में कहा कि “लिव-इन पार्टनर घरेलू हिंसा अधिनियम के प्रावधानों के तहत गुजारा भत्ते के भुगतान की मांग कर सकता है।“ यह भी देखिये, इंद्रा शर्मा बनाम वी के वी शर्मा, (2013) 15 SCC 755.

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