स्टैंड अप कॉमेडी और मौलिक अधिकारों की समसामयिकता : एक विश्लेषण

By Anshi Joshi and Gunjan Bahety









(This is our tenth vernacular post under the 2021 edition of the JILS Vernacular Publication Initiative, that marks the celebration of the International Mother Language Day. Through this initiative, we at JILS, are attempting to take a small step towards making legal education and information more inclusive and accessible, and countering the stronghold of English in legal academia with publication in vernacular languages.)









अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्टैंडअप कॉमेडी की संस्कृति का परिचय:

पुरातन काल में बड़े बड़े राजा महाराजा अपने दरबार में कलाकारों को आमंत्रित करते थे, और उनकी कला के प्रदर्शन का लुत्फ़ उठाकर उन्हें सम्मानित किया करते थे। गायकों से लेकर कवियों तक विभिन्न कलाकार राजा के दरबार में आकर सबका मनोरंजन करते व इनाम पाते थे। इन्ही कलाकारों में एक होता था विदूषक – मसखरा, हँसाऊ या जोकर जिसका काम होता था चुटकुले सुना कर राजा को हँसाना। ये चुटकुले राजा के लिए भी होते थे,  और राजा पर भी होते थे।[1] परन्तु सभी धीर गंभीर चक्रवर्ती राजा-महाराजा हास्य रस का सादर रसपान करते थे। राजाओं की सत्ता चुटकुलों से डगमगाया नहीं करती थी।[2]

आज भारत देश में राजा या बादशाह का नहीं ,अपितु एक लोकतान्त्रिक रूप से नियुक्त सरकार का शासन है। विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र आज संविधान की छत्रछाया में फलफूल रहा है और अपने नागरिकों को मौलिक व संवैधानिक अधिकार उपलब्ध करा रहा है।

अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत भारत का संविधान मौलिक अधिकार के रूप में वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। लेकिन यह अधिकार अनुच्छेद 19(2) के तहत लगाई गई सीमाओं के अधीन है जो राज्य को विभिन्न आधारो पर उचित प्रतिबंध लगाने का अधिकार देता है। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी लोकतंत्र का आधार है | यह लोगो को अपने विचारो, भावनाओं और राय को संवाद करने की अनुमति देता है और ऐसा करने से हर व्यक्ति को आत्मतृप्ति मिलती है। 

स्टैंडअप कॉमेडी एक हास्य शैली है जिसमे एक कॉमेडियन लाईव दर्शकों के सामने एक माइक्रोफोन के माध्यम  से सीधे उनसे बात करता है और उन्हें हँसाता है। पिछले कुछ सालों से यह देखा जा रहा है कि समाज में व्यंग्य की स्वीकार्यता कम होती जा रही है। लोग चुटकुलों और व्यंग्य को लेकर अतिसंवेदनशील होते जा रहे हैं। चाहे वह कुणाल कामरा के ट्वीट्स हो, अग्रिमा जोशुआ के चुटकुले, या रचिता तनेजा के कार्टून्स, यह देखा जा रहा है कि सार्वजनिक तौर पर बनाये गए चुटकुलों को लोग निजी तौर पर खुद से जोड़ रहे और आक्रामक रवैया अपना रहे हैं।

ज़्यादातर लोगों के गुस्से का कारण सिर्फ यह होता है कि कोई चुटकुला या मज़ाक उनके राजनीतिक, धार्मिक या सामजिक विचारधारा और धारणा के विपरीत है। यह गुस्सा आलोचना से लेकर अपशब्दों और धमकियों से लेकर एफआईआर तक के रूप में जाहिर होता है। कई बार ऐसी परिस्तिथियों में ये आलोचना न पसंद करने वाले लोग इन कलाकारों की जान लेने की कोशिश तक करते है और बलात्कार की धमकियां देते हैं,[3] जो जाहिर तौर पर लोकतान्त्रिक प्रणाली के लिए हानिकारक है और मौलिक अधिकारों के लिए मारक है।

जैसा कि कॉमेडियन वीर दास ने कहा है,  “और यदि आप सोचते हैं कि हँसी क्या है, तो यह सांसों के द्वारा हवा का लेना और छोड़ना है, आपको लगता है कि आपके पास बोलने की स्वतंत्रता नहीं है? आपको सांस लेने की आजादी नहीं है! ”

अगर हम मुनव्वर फ़ारूक़ी का मामला भी देखें तो सिर्फ इस आधार पर उसे गिरफ्तार कर एक महीने जेल में रखा गया व दो बार उसकी जमानत खारिज कर दी गयी क्योंकि उसके द्वारा किसी धर्म विशेष पर हास्यास्पद टिप्पणियां होने के आरोप थे, और चार साल पहले उसने धर्म विशेष पर कुछ चुटकुले सुनाये थे।  एक धर्म विशेष की भावनाओं की क़द्र करने में हमारी न्यायपालिका इतनी मशगूल हो गयी कि वह न्याय के सूत्र ही भूल गयी और अपने ही बनाये नियमों की अवमानना कर बैठी। कई सारे मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह फैसला दिया कि जमानत नियम है और जेल अपवाद, जिसे निचली अदालतों ने नज़रअंदाज़ कर दिया।

अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति पर बंधन के बीच के टकराव को सुलझाने की कोशिश की जाए तो यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए क्योँकि भारत का संविधान भी यही कहता है। अनुच्छेद 19(1)(a) स्वतंत्रता देता और सिर्फ कुछ सीमित परिस्थितियों में ही इस स्वतंत्रता को बाधित करता है; जिसका मतलब है ये बंधन अपवाद हैं; मुख्य नियम नहीं।

कानूनी रूप में भी कॉमेडी या व्यंग्य एक व्यक्ति की अभिव्यक्ति का हिस्सा है और इसी वजह से इनकी रक्षा करना संविधान का सही अनुसरण है। निम्न कारणों से इसको रक्षित करना आवश्यक है:









पेशे के रूप में स्टैंडअप कॉमेडी और रोज़ी का अधिकार:

स्टैंडअप कॉमेडी की संस्कृति न केवल अब लोकप्रिय हो गई है, बल्कि आजकल के क्लासिक प्रदर्शनों में भी आकर्षण का केंद्र बन चुकी है पिछले दशक में यह बड़े पैमाने पर विकसित हुआ है और, पश्चिम में यह दशकों से अस्तित्व में है। प्रसिद्ध कॉमेडियन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बड़ी संख्या में ग्राहक हैं। यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि स्टैंडअप कॉमेडी अपने आप में एक पूर्णकालिक पेशा बन चुका है जो आजकल काफी चलन में है।[4] अब जबकि कई युवा इसका हिस्सा बन रहे हैं, इन हास्य कलाकारों का एक समुदाय बन चुका है। खुद को कॉमेडी के क्षेत्र में स्थापित करना और अपने दर्शकों को विचित्र तरीको से कहानियों को पेश करना करना और मनोरंजक तरीके से हंसाना उनके पेशे व जीवन का उद्देश्य बन चुका है।

अपने पेशे के माध्यम से उन मुद्दों के बारे में बात करने के उनके अधिकार को दबाने से न केवल उनके भाषण और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा, बल्कि अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत किसी भी पेशे का अभ्यास करने के उनके मौलिक अधिकार में भी बाधा उत्पन्न होगी। कॉमेडियन उन मुद्दों पर प्रदर्शन करते है जिन्हें वे व्यक्त करना ज़रूरी और उचित समझते है या जिनके बारे में वह महसूस करते है। मुद्दों की पसंद को किसी भी प्रकार से बांधा नहीं जा सकता।[5] इसलिए यह किसी विशेष धर्म, राजनीतिक दल, पेशे, स्थानों या किसी अन्य विषय पर हो सकता है। यह पेशा ही है जो उन्हें हास्यपूर्ण तरीके से उनके परिप्रेक्ष्य में बात करने की मांग करता है।[6] इस तरह की अभिव्यक्ति पर तब तक अंकुश नहीं लगाया जाना चाहिए जब तक कि यह अश्लील, किसी संवेदनशील समूह के प्रति असंवेदनशील, सार्वजनिक उपद्रव में परिणाम, देशद्रोह, भेदभाव या घृणा को उकसाने का प्रयास न करता हो।

कोर्ट ने कहा है कि यह एक ज्ञात तथ्य है कि एक विशेष बिंदु को उजागर करने के लिए एक स्टैंड-अप कॉमेडियन उसी हद तक अतिरंजित करता है कि यह एक व्यंग्य और कॉमेडी बन जाता है। लोग स्टैंड-अप कॉमेडियन द्वारा की गई टिप्पणियों या चुटकुलों को सच्चाई के बयान के रूप में नहीं देखते हैं, लेकिन उसे नमक की एक चुटकी बराबर समझते है। स्टैंड-अप कॉमेडी समाज की कमियों को उजागर करने के प्रयोजनों के लिए एक रचनात्मक माध्यम है।[7] लोकतंत्र का सार यह है कि एक रचनात्मक कलाकार को समाज की तस्वीर को उस तरीके से पेश करने की स्वतंत्रता दी जाती है जो वह मानता है। समाज की विचारधाराओं को उजागर करने के प्रमुख रूपों में से एक है, व्यंग्य चित्र को चित्रित करना । स्टैंड-अप कॉमेडियन बहु-उद्देश्य से प्रदर्शन करते हैं। अपने चित्रण में वे व्यंग्य का उपयोग करते हैं और खामियों को इस हद तक अतिरंजित करते हैं कि यह उपहास बन जाता है।[8]

इसके अलावा, 1952 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ब्लासफेमी (ईश निंदा) को असंवैधानिक ठहरा दिया क्योंकि यह पहले संशोधन का उल्लंघन माना गया था।[9] वास्तव में, भारत ने स्वयं संयुक्त राष्ट्र (UN) में पाकिस्तान द्वारा ब्लासफेमी कानून के दुरुपयोग का मुद्दा उठाया था।[10] सिर्फ धार्मिक भावनाओं के आधार पर किसी के मौलिक अधिकारों का हनन संविधान का अपमान है और क़ानून के शासन के विरुद्ध है जिसका एक कारण यह भी है हमारा देश धर्मनिरपेक्षता को मानता है |

इसी तरह किसी भी कानून के पर्दे के पीछे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन लेना और ऐसे कानून का दुरुपयोग करना हमारे लोकतंत्र के खिलाफ है।









असंतोष की आवाज़  के रूप में स्टैंडअप कॉमेडी और वाक् अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार:

कॉमेडियन, समाज में व्याप्त निराशा की आवाज हैं। उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देती है। ये कलाकार प्रेशर कुकर की सीटी की तरह काम करते हैं। सीटी कुकर के अंदर का दबाव छोड़ती है, और इस तरह कुकर में विस्फोट नहीं होता है। इसके अलावा सीटी कुकर के अंदर भोजन की स्थिति को समझने की अनुमति देता है। इसी तरह कॉमेडियन समाज में निराशा को व्यक्त करते रहते हैं और इस तरह असंतोष के दबाव को निर्मित नहीं होने देते। यह सरकार को समाज की स्थिति समझने में मदद करते है। शोषितों के दृष्टिकोण से बात करने पर कॉमेडी असंतोषी की आवाज़ बन जाता है और इस आवाज़ को दबाना अनुच्छेद 19 का उल्लंघन है ।

जस्टिस ओलिवर वेंडेल होम्स का  “विचारों का बाज़ार” सिद्धांत इस धारणा को संदर्भित करता है कि विचारों की सच्चाई या स्वीकृति की परीक्षा एक दूसरे के साथ उनकी प्रतिस्पर्धा पर निर्भर करती है न कि सेंसर की राय पर, चाहे वह सरकार द्वारा प्रदान की गई हो या किसी अन्य प्राधिकरण द्वारा।[11] अब्राम v. यूनाइटेड स्टेटस[12] में जस्टिस ओलिवर वेंडेल होम्स जूनियर द्वारा “विचारों के बाज़ार” का पहला संदर्भ था। बहुमत से अलग होकर, उन्होंने स्वतंत्र अभिव्यक्ति को बरकरार रखा। तब से, सर्वोच्च न्यायालय और संघीय न्यायाधीशों द्वारा सेंसरशिप का विरोध करने और विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करने के लिए इसे कई बार लागू किया गया है।[13]









मानसिक तनाव से बचने के रूप में स्टैंडअप कॉमेडी:

स्टैंडअप कॉमेडी केवल चुटकुलों के बारे में नहीं है, बल्कि अक्सर मानसिक राहत से भी जुड़ा होता है।[14]

तनाव से राहत दिलाने वाला होने के साथ ही स्टैंड-अप कॉमेडी लंबे समय तक दर्द प्रबंधन में भी मदद कर सकता है।[15] ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए 2011 के एक अध्ययन से पता चला है कि जितना अधिक हंसे, उतना ही कम दर्द महसूस होगा। अध्ययन से यह भी पता चलता है कि यह हँसी ही है, जो न केवल सकारात्मक भावनाओं में वृद्धि करती है वरन दर्द से भी राहत दिलाने में सहायता करती है।[16]

कोविड –19 महामारी में, स्टैंडअप कॉमेडियन हंसी और मानसिक कल्याण के लिए एक स्रोत बन गए। ये अभूतपूर्व समय हैं, जिसमें हम रह रहे हैं और यहां तक कि सबसे मजबूत दिमाग वाले भी कभी-कभी दबाव महसूस करना शुरू कर सकते हैं। दिनों, हफ्तों और महीनों के लिए घर में बंद रहना हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए बुरा है, और इसलिए, खुशी और कुछ हँसी महत्वपूर्ण है, जहां खासतौर पर तब जब हर कोई इसे पा सके ।[17] इसीलिए कॉमेडी की संस्कृति हमारे जीवन का हिस्सा होनी चाहिए। यह एक तरह की थेरेपी भी है। जो चीज खुशी लाती है, वह ताजा दृष्टिकोण भी लाती है। लोगों से मानसिक सुकून के संसाधन छीन लेना भी अनुच्छेद २१ के तहत जीने के अधिकार का हनन है।









निष्कर्ष:

इसलिए यह आवश्यक है कि अखबार और न्यूज़ चैनलों की तर्ज़ पर कॉमेडी को भी अनुच्छेद 19 और 21 के तहत संरक्षण प्राप्त होना चाहिए | अतः विचारों का आदान प्रदान कायम रखने के लिए लोकतंत्र में सरकार के मनमानेपन पर नियंत्रण रखने व संविधान के आदर्शों को जीवित रखने व असली जीवन में सम्मिलित करने हेतु हास्य व्यंग्य और कॉमेडी का संरक्षण आवश्यक है, और यह कहना गलत नहीं होगा कि कॉमेडी की स्वतंत्रता की मौजूदगी हमारे वर्त्तमान तथा भविष्य की ज़रुरत है।









The authors, Anshi Joshi and Gunjan Bahety , are currently law students at the Maharashtra National Law University (MNLU), Nagpur.

We would like to extend our special thanks and gratitude to Aditi Singh, a third-year law student at the West Bengal National University of Juridical Sciences (NUJS), Kolkata, for assisting us with her review and inputs.










[1] Devdutt, The Death of the Vidushak, Devdutt, available at https://devdutt.com/articles/the-death-of-the-vidushak/ last seen on 11/02/2021.

[2] C.M. Naim, Popular Jokes and Political History, Economic and Political Weekly, Vol. 30, No. 24 (Jun. 17, 1995), pp. available at 1456-1464 JSTOR https://www.jstor.org/stable/4402881 last seen on 05/02/2021.

[3] Nayanika Sengupta, Comedian Arigma Joshua Was Sent Rape Threats Over Joke on Shivaji Statute, Twitter Says #ArrestShubhamMishra, India Today, available at https://www.indiatoday.in/india/story/comedian-agrima-joshua-stand-up-comedy-chhatrapati-shivaji-statue-shubhammishra-1699784-2020-07-12, last seen on 11/02/2021.

[4] Aishwarya Girinarayanan, All I Do is Standup, The Hindu, available at https://www.thehindu.com/life-and-style/all-i-do-is-stand-up/article19620168.ece last seen on 7/02/2021; Standup Comedy Careers in India, Tips and Advice, Careerizma, (Feb 7, 2021, 4:00 PM) https://www.careerizma.com/blog/standup-comedy-careers-in-india/ last seen on 7/02/2021.

[5] Ashutosh Dubey v. Netflix I.A. 3754/2020 in CS(OS) 120/2020.

[6] Id.

[7] Id.

[8] Id.

[9] Apurv Shaurya, Internet Humor and Crime: A Struggle Between Freedom and Offence, SCC OnLine, available at https://www.scconline.com/blog/?p=239137 last seen on 14/02/2021.

[10] Sidhant Sibal, At United Nations India Raises Issue of Misuse of Blasphemy Laws by Pak Against Minorities, DNA, available at https://www.dnaindia.com/india/report-at-united-nations-india-raises-issue-of-misuse-of-blasphemy-laws-by-pak-against-minorities-2845410 last seen on 08/02/2021.

[11] David Schultz, Marketplace of Ideas, The First Amendment Encyclopedia, available at https://www.mtsu.edu/first-amendment/article/999/marketplace-of-ideas last seen on 12/02/2021.

[12] Abrams v. United States, 250 U.S. 616 (1919, Supreme Court of the United States).

[13] McCreary County v. American Civil Liberties Union, 545 U.S. 844 (2005, Supreme Court of the United States);  Reno v. American Civil Liberties Union, 521 U.S. 844 (1997, Supreme Court of the United States).

[14] Kayla Matthews, 6 Powerful health Benefits of Laughter, HuffPost, available at https://www.huffpost.com/entry/6-powerful-health-benefit_b_6445086, last seen on 16/02/2021.

[15] Id.

[16] Maia Szalavitz, It’s No Joke: Why Laughter Kills Pain, Time, available at https://healthland.time.com/2011/09/14/its-no-joke-why-laughter-kills-physical-pain/, last seen on 13/02/2021.

[17] Lockdown life getting you down? These stand-up comedy specials will ward away those pandemic blues, Hindustan Times, available at https://www.hindustantimes.com/tv/lockdown-life-getting-you-down-these-stand-up-comedy-specials-will-ward-away-those-pandemic-blues/story-cctOdhlgUmJBiaVz0FHxmL.html, last seen on 16/02/2021.

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